Shdika

**जिसके सहारे हम राह ढ्ंढते थे
वो खुद दुबका है कोहरे मे ।

**आधुनिक शिष्य)
गुरू ने शिष्य से दक्षिणा में अंगूठा मांगा ।
उस ने गुरू को ठेंगा दिखा दिया ।

** (कुंभ कर्ण)
यह दो दिन जागता है।
एक १५अगस्त और२६जनवरी ।
बाकी साल सोता है ।

**उनके भाषणो मे है कुर्सी की चिन्ता ,
हमे है रोटी की फिक्र ।
उनके सब्ज बागों में
कहां है भूख का जिक्र ।

**सूरज की नन्ही किरण
रात के गहन तिमिर को चीर देती है।
चाह की तड़प ,
ऊंचे ऊंचे शिखरों को चीर देती
है ।
एक छोटी सी ड़ोंगी ,
बड़े बड़े तूफानों से लड़ के पार लगा देती है।

**घनी छांव की चाह में
धूपभी खो बैठे
बरगद की तलाश में
बबूल के नीचे जा बैठे ।

**ख़ुश रहो अह़ले
वतन कह कर ये
बैठ गये
र्कुसी पर वे ।

**एक बार ही
खोली थी खिड़की
घुस आया बसंत
तभी से ड़रता हूं
खिड़की सदा ही
बन्द रखता हूं ।

**आदमी ,
मेकअप की परतें चढ़ाते जीता है ,
जिस रोज भी ,
खुद को आईने के सामने ,
बिना मेकअप के पाता है ,
खाली धक्के ,
से ही मर जाता है ।

**एक हाथ में कविता संग्रह ले
दूजे में तलवार ,
बोले इनमें से क्या पसंद है ?
हमने ,
चुपचाप तलवार के नीचे ,
अपना सर रख दिया ।

**राम मिलाई जोड़ी ,
वो कवि उन्हें मिलीं कवियत्री ,
सफल हुआ विवाह ,
एक दूजे को सुने सुनाए
अच्छा हुआ र्निवाह ।

**कल भी अंगारे होंगे।
कल भी होंगे कांटे ।
माथे पर शिकन पड़े ।
डूब ना जांए मुस्कुराहटें।।

**नागो को नथा
नागों को पाला
फिर भला क्यूं
र्सप दंश से मरे?

**बाजीगरी में ,
उनका कोई सानी नहीं ,
बदल लें रूप ,
जितने चाहें ,
घूम घूम कर ,
कुर्सी के चारों ओर ।

**शाखों पर ,
फूटेंगी कोंपले ,
उन्हीं पर आयेगा बसन्त ,
ठूंठ का क्या ,
ना सावन हरा ,
ना भादों हरा ।।

**जाने क्या हुआ।
क्यूं बैठे-बैठे
आंख छलछला आई।
ना जाने किसकी याद आई।।

**आई जो कभी को नींद ,
तो तेरी यादें जगा गयीं ,
आ_आके नींद ,
यूं पलकों से फिर गयी

**आई जो कभी को नींद ,
तो तेरी यादें जगा गयीं ,
आ_आके नींद ,
यूं पलकों से फिर गयी

**कल मैंने ,
उनसे कहा पियोगी ,
उन्होंने कहा कभी पी नहीं।
मैंने कहा इम्पोर्टेड स्काच विहस्की है।
बहुत आग्रह करने पर ,
चख कर बोलीं ,
ये तो निरा ठर्रा है।।

**एक तो रात का अभिसार ,
और तुम्हारा ये श्रृंगार ,
हो गये थे एकाकार ,
ज्यूं अमृत और गरल ।

**हिम-शिखर पिघल रहे हैं ।
जंगल कट रहे हैं ।
नदियां सूख रहीं हैं ।
सागर सूख रहे हैं ।
अब तुम्हारी आंखों ,,
की उपमा किस से देंगे।

कोई कहदे , याद ना मुझको।
जो बीत गया सो स्वपन था।
कल एक अतीत था ,
पल अब रीता पल
क्यों दुखी करें खुदको ।।

सवेरे सवेरे सूरज देखने,
वो दिया ले कर निकलें हैं ।
अंधों की बस्ती में हम ।
आईने बेचने निकले हैं।‌।
सड़क खुरच रहें हैं इस उम्मीद में।
शायद किसी के सिक्के गिरे हैं।

बापू का सिक्का तो चलता है ,
पर ,
भारत में उनका सिप्पा नहीं चलता।

बात वक्त की होती है।
बात वक्त पर होती है।
बात बे वक्त का होता है फर्क।‌
वे वक्त बात नहीं बनती है।।

लोग कहते हैं ,
आस्तीनो में सांप होते हैं ,
इसीलिए तो उसके कुर्ते ,
बिना आस्तीनो के होते हैं।

अरे ! ये क्या करते हो ?,
अबस , मुंह बनाते हो ।
हमने आईना ही तो ,
दिखाया था,
कोई गुनाह तो,
नहीं किया था।
खमाख्वा यूं ही,
खफा होते हो।
अजी; छोड़ो भी ,
हमारी गुस्ताखी को ,
माफ़ भी करो ,
क्यूं कता ताल्लुक,
अबस करते हो,
छोड़ो भी,अजी ,
ये क्या गजब ढाते हो ।

बरसात के मौसम में,
उन्हें बोरियत होती है,
नमी से मुंह चिप चिपाता है,
भेद सारा उभर जाता है।।

वो घर घर डोल रहा,
सबसे हंस हंस बोल रहा,
सबको शीश नवाता ,
क्या सखि बसंत रे ,
ना सखि रे नेता।।

कभी कभी अनजाने चेहरे,
जाने पहचाने से लगते हैं ।
और जाने पहचाने पराये,
देख के जब रुख फेर लेते हैं।।

बाढ़ आए ,
या पड़े सूखा,
भारत,
भूखा का भूखा।।

एक बार ही,
खोली थी खिड़की,
घुस गया बसंत,
तभी से ड़रता हूं,
खिड़की सदा,
बन्द रखता हूं।

घिरे तो बदरा यहां पर,
बरसे न जाने कहां पर,
रह गये पांवड़े बिछाए,
करते इंतजार यहां पर।

सत्यमेव जयते।
श:श चुप।
पागला सत्य ,
सुन लेगा,
तो ना जाने,
कब तक,
तुम्हारी नादानी,
पर हंसेगा।।

मौत तो,
एक पल है,
और है भी,
अवश्यंभावी।
फिर क्यों ,
जिन्दगी के ,
हजारों पल ,
बर्बाद करें।
मृत्यु वरण करेगी ,
जब केरेगी,तब करेगी,
आज क्यों,
समय बर्बाद करें।।

तुम उधर बीमार,हम इधर बीमार,
ऐसे में कौन किसकी करे तीमारदारी।
अजब रुख़ हवाओं, ऋतुओं का ,
आज अजब-गजब फिज़ा है भारी।।

तुम भी नंगें,हम भी नंगें,
हमाम में हम सभी हैं नंगें ,
बेमानी यहां बहस सभी,
अब और कहां,
किसके कपड़े खींचे ।
तुम हमारी बात ढ़ंके,
वक्त पे तुम, हमारी ढांपे,
बस अब चुप भी रहो,
और हम भी ख़ामोश रहें
इस मुल्क के बेताज बादशाह ,
को इसका पता ना चले।।

मैं मौन हूं ,
नम आंख भी ,
वो क्या गई,
सभी खुशियां समेट ले गई ,
सारी संवेदनाएं भी ले गई ।
और मुझे जड़वत छोड़ गई।
अब मैं, मैं नहीं,
प्रस्तर प्रतिमा शेष रह गई।।

अब कोई ,
अध्याय शेष नहीं।
अब तो ,
परिशिष्ट पढ़ रहे हैं।।

साकंर घर की लग गई ,
रात भई जो देर ,
रे मन बैठ देखिए,
दिनन के फेर ।

शब्द,
यदि इतिहास हो गये,
तो भूल जायें ,
ढूढें नई उपमाएं,
गढ़ लें शब्द नऐं ।

कितने,
निर्मम सपने,
ढोये हमने उम्र भर।
टूट कर,
बिखर गये,
जीवन के,
अन्तिम पल पर।।

यह कैसा गणतंत्र,
गण बूझ रहा,
अपने होने का मंत्र ।

वो लोग जुदा थे,
जो चले थे अकेले,
अब हैं लोगों के रेले ,
या फिर ,
लुटेरों के मेले।

जीवन है मात्र इक मृगतृष्णा।
कर्म बिना मुक्ति कहां,
गीता में यही कह गए कृष्णा ।

नीम के पेड़ पर ,
शहद का छत्ता ,
नीम कड़ुआ,
शहद मीठा।
आदमी कितना,
भी शहद चाटे ,
रहेगा जहर भरा।

“आक्षेप “
जब मैंने ,
उसे चरित्रहीन कहा,
तो उसने,
पलट के जवाब दिया,
तुम्हारा चरित्र,
आजमाने का ,
मौका नहीं मिला।।

मैंने खोता,
गांवों का बचपन ,
कस्बों का कैशोर्य ,
शहरों की,
जवानी देखी है और
महानगरों को घसीटते, रेंगते,
सिसक सिसक कर ,
मरते देखा है।

लोग सरे राह कंदीलें जला रहे हैं ।
सब वतन का सोग मना रहे हैं।
लाशें सर अब कौन गिनता है,
एक भीड़ है लोग रोज मर रहे हैं।

बहुत कुछ सोचा,
पर कुछ ना किया ,
फिर जीने से ,
है क्या फायदा।
हमने ,
एक दूजे को कोसने के,
सिवा क्या किया।

कानों में पिघला सीसा ,
जुबां पर है जड़ा ताला,
आजकल आजादी का ,
अजीब है चलन निराला।
कान में पिघला सीसा का अर्थ बहरा बना देना।

ना खुल के ,
कुछ कह सके,
ना खुल के,
रो ही सके,
रह गईं आंखें,
गरगला के।

शोहदा”
साढ़ के दशक में हमारा शहर ,कस्बे नुमा शहर था ।दो चार सड़कें , एक मुख्य बाजार। शहर में कुल जमा दस बारह कारें , पांच दस स्कूटर मोटरसाइकिल थीं। दो तीन स्कूल कालेज की बसें। सड़कें लगभग दिन भर सूनी रहतीं।आने जाने के मुख्य साधन तांगे , साइकिलें या फिर पैदल । सुबह शाम सड़कें स्कूल , कालेज या आफिस जाने वालों से आबाद रहतीं थीं।
हमारा घर एक मुख्य सड़क के किनारे था , घर के सामने सड़क ,बगल में एक गली और गली के उस पार एक टूटी दीवार , जिसपर बैठा जा सकता था अथवा उसका सहारा लेकर खड़ा भी हुआ सकता था ।
मेरे कमरे की एक खिड़की सड़क की ओर ,दूसरी गली की तरफ ।
मैं सवेरे सवेरे सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की से झांकती तो स्कूल कालेज जाने वाले विद्यार्थियों की भीड़ होती थी। जब गली की खिड़की से देखती तो दीवार पर कुछ शोहदे बैठे नजर आते , जो आती जाती लड़कियों पर फब्तियां कसा करते । अक्सर पापा कहते कि ये शोहदे हैं , इन्हें मत देखा करो और खिड़की बंद कर दिया करते ।
एक दिन जब सवेरे दस बजे के आसपास गली वाली खिड़की खोली तो एक सांवला नौजवान ,जिसकी मश्कें अभी भीगीं ही थी ,साइकल पर बैठा दीवार की सहारा ले खड़ा था । वो शायद कालेज स्टूडेंट था , उसके साइकल के चैन कवर में एक पतली सी कापी ठूंसी थी।
वो नौजवान मुझे आकर्षक लगा ,सो मैंने सोचा देखते हैं ये क्या करता है । थोड़ी देर बाद जब कालेज जाने वाली लड़कियां निकलीं तो वो उन्हें चुपचाप देखता रहा , यादाकदा किसी लड़की को देख कोई खूबसूरत शेर सुना देता या उसकी सुन्दरता अथवा पहनावे पर कोई शेर बोल देता । अक्सर लड़कियां उस इग्नोर कर निकल जातीं । कभी-कभी कोई लड़की मुड़ कर देख लेती , कभी कभी कोई हल्की सी मुस्कुराहट भी फेंक दिया करती तो वो निहाल हो जाता और साइकिल उठा उसके पीछे चल पड़ता किंतु थोड़ी दूर जाकर के पलट आता । कभी भी उसने किसी लड़की पर कोई अश्लील फिकरा नहीं कसा ,ना ही कोई गिरी हरकत करी । कभी-कभी जब कुछ लड़कियां जब तांगे में निकलतीं तो वो तांगे के पीछे पीछे गाना गाते चलता रहता । तांगे में बैठीं लड़कियां आपस चुहलबाज़ी करतीं ले ये तेरे लिए गा रहा है और एक दूसरे को छेड़तीं पर मन ही मन सोचतीं ;काश ये मेरे लिए गा रहा होता।
यह क्रम यूं ही चलता रहा और मेरी रूचि उसमें बढ़ती ही गई , अक्सर मैं उसे रोज़ घंटों निहारती रहती।वो भी रोज़ सवेरे घंटों ,उस दीवार के सहारे साइकिल पर खड़ा रहता , जब कोई परिचित पास से निकलता तो या तो झुक कर चैन ठीक करने लगता या आकाश में उड़ती पतंग को ।कभी कभार कोई बुजुर्ग कह भी देता “क्यों पेंच लड़ाये जा रहे हैं तो वो चुप रह दूसरी ओर देखने लगता। वो जहाज के पंछी की तरह था जो थोड़ी दूर उड़ वापस जहाज पर लौट आता।
ऐसे ही कई दिन गुजर गए तो एक दिन जब घर में कोई नहीं था , अचानक मैं घर से निकली और उसके सामने पहुंच कर बोली ” आप क्यूं इनके पीछे भागते हैं , मैं आप से मुहब्बत करती हूं ,क्या आप मुझसे प्यार करेंगे ।”
पहले तो वो अचानक मुझे देख हतप्रभ रह गया , फिर धीरे से बोला “नहीं ! तुम अभी नहीं जानतीं मुहब्बत में कितने दुःख दर्द हैं , कितने ग़म हैं । रातों की नींद उड़ जाती है , घर महफ़िल में दिल लगता नहीं , चैन कहीं आता नहीं। तुम अभी अभी बड़ी खुश हो मैं तुम्हे दुःखी नहीं कर सकता।” इस पर मैंने पूछा फिर ये सब क्या ? उसने कहा मैं जिससे मुहब्बत करता था वो अब बहुत दूर है , ये सब तो उसके गम उसकी यादें भुलाने के लिए करता हूं । यह सब दिखावा है ।
उसका जवाब सुनकर मैं चुपचाप लौट आई । दूसरे दिन जब वो खिड़की खोली तो वह नज़र नहीं आया और फिर कभी नहीं वो शोहदा दिखाई दिया।

“धज्जी -धज्जी दिन”
विचार अब पांखी बादल से हो ग्रे हैं ।अब विचार कंसोलिडेट नहीं हो पाते , विश्रृंखलित रहते हैं,मसलन :–
१ कभी कभी सोचता हूं कि अक्सर राजनीतिक दलों के कोषाध्यक्ष वृद्ध क्यों होते हैं , वो इसलिए कि हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सर्प योनि में जीव की आयु सबसे लम्बी होती है और सांपों का ख़ज़ाने की रक्षा मरते दम तक करते हैं।
२:-आत्मा अजर अमर है और कुर्सी कुछ लोगों की आत्मा अतः और कुछ नहीं तो मार्ग दर्शक मंडल ही सही।
३:-पहले गुरु होते थे , अब गुरूघंटाल । चूंकि अब अहिंसा का जमाना है इसलिए अब वो अंगूठा कटवाते नहीं अपितु सादे कागज पर अंगूठा लगवा लेते हैं।
४:- औरतें बूढ़ी इसलिए नहीं होती क्यों कि वो गृह लक्ष्मी होती हैं और लक्ष्मी सदैव चंचल होती हैं तथा उनकी पसंद नापसंद पल-पल बदलती रहती है , जो उन्हें बूढ़ा नहीं होने देती ।
५:- जब कोई शख्स बात -बात में यह कहें कि उसने यह किया था-वो किया था तो समझिए वो कोई सेवा निवृत्त अधिकारी अथवा कर्मचारी है।
६:- आदमी लाख अपनी उम्र छिपाये पर उसके पसंद के फिल्मी गीत और उसका सोच सारी दास्तां कह देता है।
७:- कुछ लोग किसी कवि अथवा लेखक के लेखन को उसके धर्म अथवा राजनैतिक सोच कर देखते हैं यह उनकी रचनाओं का अपमान है। हां यदि कोई विशेष धर्म या राजनैतिक विचारधारा के समर्थन में लिखता है तो वो सर्वमान्य नहीं है।
७:-यदि गांधी को हत्यारा नहीं मारता तो कुछ समय पश्चात उनके चाहने वाले ही मार देते , क्योंकि वो गांधीजी की बातों से सहमत नहीं हो पाते ।
८:- पहले चेले गुरूओं के पैर छूते थे, अब उनके पैर खींच लेते हैं।
९कभी-कभी कोई पार्टी आंधी की तरह उठती है , वो फिर साबुन के झाग की तरह बैठ भी जाती है।
१०:- पहले कविता -लेखन जंगलों में कुलांचे भरता था अब वातानुकूलित गोष्ठियों की चेरी ।
कभी-कभी मुझे भी ऐसा लगता है कि मैं भी चुक गया हूं और भूत हो गया हूं।

आज हूं गंगा घर में नाये ।
प्रभु तुम्हीं हरो दुविधा,
का विधी मैं पंखारूं पाये।

उन्होंने तो सुना दी पूरी गाथा ,
हम खोजते ही रह गए शब्द ,
कहने को हमारी व्यथा ,
अक्सर फिसल जाते हैं शब्द।








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